उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी वक्त है, लेकिन उससे पहले ही बीजेपी से लेकर समाजवादी पार्टी तक अपनी ताकत और कमजोरियों को आंकने में लगी हैं। राम मंदिर चंदे से जुड़े विवाद और छात्रों के आंदोलन जैसे मुद्दों के बीच बीजेपी के लिए कराए गए एक सर्वे के नतीजों ने सियासी हलचल बढ़ा दी है।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, बीजेपी ने विधानसभा चुनाव से पहले Nation With NaMo नाम की एजेंसी से उत्तर प्रदेश में सर्वे कराया है। रिपोर्ट में बीजेपी को मौजूदा स्थिति के मुकाबले बड़ी संख्या में सीटों के नुकसान की संभावना जताई गई है।
फिलहाल उत्तर प्रदेश विधानसभा में बीजेपी के पास 257 विधायक हैं, जबकि समाजवादी पार्टी के पास 101 सीटें हैं। सर्वे के अनुमान के मुताबिक, अगर मौजूदा परिस्थितियों में चुनाव होते हैं तो बीजेपी को 190 से 205 सीटें मिल सकती हैं। यानी मौजूदा संख्या के मुकाबले करीब 52 से 67 सीटों का नुकसान हो सकता है। सर्वे के अनुमान में करीब 10 प्रतिशत ऊपर-नीचे बदलाव की गुंजाइश भी बताई गई है।
30-35% विधायकों को लेकर नाराजगी का दावा
सर्वे में बीजेपी के लिए एक और चिंता मौजूदा विधायकों को लेकर सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, जनता के बीच बीजेपी के करीब 30 से 35 प्रतिशत विधायकों के खिलाफ नाराजगी देखी गई। सर्वे में सुझाव दिया गया है कि पार्टी को चुनाव से पहले बड़ी संख्या में मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर नए चेहरों को मौका देना पड़ सकता है।
सर्वे टीम का मानना है कि अगर 2027 का चुनाव धर्म, राष्ट्रवाद और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर केंद्रित रहता है तो बीजेपी को फायदा मिल सकता है। वहीं, अगर समाजवादी पार्टी 2024 लोकसभा चुनाव की तरह PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को प्रभावी तरीके से आगे बढ़ाती है तो बीजेपी के लिए चुनौती बढ़ सकती है।

किन मुद्दों से नाराज बताई गई जनता?
सर्वे में कुछ लोगों ने UGC के नए नियमों, राम मंदिर चढ़ावे से जुड़े विवाद, NEET पेपर लीक और E20 एथेनॉल पेट्रोल जैसे मुद्दों को लेकर नाराजगी जताई। इसके अलावा स्थानीय विधायकों का कामकाज और क्षेत्र में विकास कार्य भी मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण मुद्दे बताए गए हैं।
यादव और गैर-यादव समीकरण पर भी सर्वे में चर्चा
सर्वे में यादव मतदाताओं और गैर-यादव वर्ग के बीच राजनीतिक समीकरण को लेकर भी दिलचस्प संकेत मिलने का दावा किया गया है। सर्वे टीम से जुड़े एक सदस्य के मुताबिक, यादवों को लंबे समय से समाजवादी पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता रहा है। पहले गैर-यादव वर्ग में इसे लेकर नाराजगी देखने को मिलती थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह धारणा कमजोर हुई है।
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खासकर नई पीढ़ी के मतदाताओं के बीच यादव बनाम गैर-यादव की पुरानी राजनीतिक सोच का प्रभाव कम होने का दावा किया गया है। यह बदलाव 2027 के चुनाव में राजनीतिक दलों की रणनीति को प्रभावित कर सकता है। यह सर्वे हाल के जंतर-मंतर छात्र प्रदर्शन से पहले किए जाने की बात कही गई है। ऐसे में आने वाले महीनों में राजनीतिक घटनाक्रम और नए मुद्दे मतदाताओं की राय को बदल सकते हैं। दूसरी तरफ अखिलेश यादव और राहुल गांधी छात्र प्रदर्शन से लेकर राम मंदिर चंदे से जुड़े आरोपों तक कई मुद्दों पर बीजेपी को लगातार घेर रहे हैं।
फिलहाल यह एक सर्वे का अनुमान है, चुनाव परिणाम नहीं। 2027 तक राजनीतिक परिस्थितियां, उम्मीदवार, गठबंधन और चुनावी मुद्दे बदल सकते हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश की वास्तविक तस्वीर चुनाव के करीब ही ज्यादा स्पष्ट होगी




