कल तक अयातुल्ला अली खामनेई का जनाज़ा ईरान के कोम शहर में था, जहां लाखों लोगों ने अंतिम नमाज़ में हिस्सा लिया। अब जनाज़ा इराक पहुंच चुका है। नजफ और कर्बला में बड़ी संख्या में लोग अंतिम विदाई देने पहुंचे। कई जगहों पर लोगों ने ताबूत को अपने हाथों और कंधों पर उठाकर श्रद्धांजलि दी।
नजफ में उमड़ी भारी भीड़
रिपोर्टों के मुताबिक, इराक के नजफ शहर में लाखों लोग अयातुल्ला अली खामनेई को अंतिम विदाई देने पहुंचे। ईरान में जहां जनाज़ा वाहन के माध्यम से ले जाया जा रहा था, वहीं इराक में कई स्थानों पर लोगों ने ताबूत को कंधों पर उठाकर आगे बढ़ाया।
लोगों की आंखों में आंसू थे और बड़ी संख्या में लाल झंडे भी दिखाई दिए, जिन्हें शिया परंपरा में प्रतीकात्मक महत्व दिया जाता है।
नजफ क्यों है खास?
इराक का नजफ दुनिया भर के शिया मुसलमानों के सबसे पवित्र शहरों में माना जाता है। यहां हज़रत इमाम अली का रौज़ा मौजूद है। इमाम अली, पैगंबर हज़रत मोहम्मद के चचेरे भाई, दामाद और शिया मुसलमानों के पहले इमाम माने जाते हैं।
हर साल लाखों जायरीन दुनिया के अलग-अलग देशों से यहां ज़ियारत के लिए आते हैं। कई बड़े शिया धार्मिक नेताओं की इच्छा भी नजफ में दफन होने की बताई जाती है।
कर्बला के लिए रवाना हुआ जनाज़ा
नजफ के बाद अयातुल्ला अली खामनेई का जनाज़ा कर्बला पहुंचा। कर्बला शहर हज़रत इमाम हुसैन के रौज़े की वजह से पूरी दुनिया में जाना जाता है। इमाम हुसैन, पैगंबर मोहम्मद के नवासे और शिया मुसलमानों के तीसरे इमाम थे। वर्ष 680 ईस्वी में कर्बला की जंग में उन्होंने अन्याय के आगे झुकने के बजाय अपनी जान कुर्बान कर दी थी। इसी वजह से कर्बला आज भी त्याग, इंसाफ और कुर्बानी का प्रतीक माना जाता है।
लाल झंडों की भी रही चर्चा
ईरान से लेकर इराक तक अंतिम यात्रा में शामिल अधिकांश लोग काले कपड़ों में नजर आए, जो शोक का प्रतीक माना जाता है। वहीं बड़ी संख्या में लोगों के हाथों में लाल झंडे भी दिखाई दिए। शिया परंपरा में लाल झंडे को प्रतीकात्मक रूप से इंसाफ और प्रतिरोध से जोड़कर देखा जाता है।
अब मशहद में होगा दफीना
इराक के नजफ और कर्बला में अंतिम श्रद्धांजलि के बाद जनाज़े को वापस ईरान के मशहद शहर ले जाया जाएगा, जहां 9 जुलाई को इमाम रज़ा के रौज़े के करीब सुपुर्द-ए-खाक किए जाने का कार्यक्रम है।
ये भी पढ़ें, – इजराइल ने किया जिन्हें मारने का दावा, खामनेई के जनाज़े में सामने आए ईरान के वो 3 लीडर
इमाम रज़ा को शिया समुदाय अपना आठवां इमाम मानता है। हर साल दुनिया भर से करोड़ों जायरीन यहां ज़ियारत के लिए पहुंचते हैं। इसी वजह से मशहद शिया मुसलमानों के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्रों में गिना जाता है




